॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.88.28
मेखलाजिनदण्डाक्षैस्तेजसाग्निरिव ज्वलन्।
अभिवादयामास च तं कुशपाणिर्विनीतवत्॥ २८
mekhalājinadaṇḍākṣaistejasāgniriva jvalan|
abhivādayāmāsa ca taṃ kuśapāṇirvinītavat|| 28
अर्थ
भगवान्ने मूँजकी मेखला, काला मृगचर्म, दण्ड और रुद्राक्षकी माला धारण कर रखी थी। उनके एक-एक अंगसे ऐसी ज्योति निकल रही थी, मानो आग धधक रही हो। वे हाथमें कुश लिये हुए थे। वृकासुरको देखकर उन्होंने बड़ी नम्रतासे झुककर प्रणाम किया॥ २८॥✎ 1723