देवर्षे! तुम भी उन्हींके समान ब्रह्माके मानसपुत्र हो—उनकी ज्ञान-सम्पत्तिके उत्तराधिकारी हो। तुम भी श्रद्धाके साथ इस ब्रह्मात्मविद्याको धारण करो और स्वच्छन्दभावसे पृथ्वीमें विचरण करो। यह विद्या मनुष्योंकी समस्त वासनाओंको भस्म कर देनेवाली है॥ ४४॥✎ 1722
त्वं चैतद् ब्रह्मदायाद श्रद्धयाऽऽत्मानुशासनम्।
धारयंश्चर गां कामं कामानां भर्जनं नृणाम्॥ ४४
देवर्षे! तुम भी उन्हींके समान ब्रह्माके मानसपुत्र हो—उनकी ज्ञान-सम्पत्तिके उत्तराधिकारी हो। तुम भी श्रद्धाके साथ इस ब्रह्मात्मविद्याको धारण करो और स्वच्छन्दभावसे पृथ्वीमें विचरण करो। यह विद्या मनुष्योंकी समस्त वासनाओंको भस्म कर देनेवाली है॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.87.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 686) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/87/44/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)