श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.87.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 87 · अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः

त्वं चैतद् ब्रह्मदायाद श्रद्धयाऽऽत्मानुशासनम्।

धारयंश्‍चर गां कामं कामानां भर्जनं नृणाम्॥ ४४

tvaṃ caitad brahmadāyāda śraddhayā''tmānuśāsanam|

dhārayaṃścara gāṃ kāmaṃ kāmānāṃ bharjanaṃ nṛṇām|| 44

अर्थ

देवर्षे! तुम भी उन्हींके समान ब्रह्माके मानसपुत्र हो—उनकी ज्ञान-सम्पत्तिके उत्तराधिकारी हो। तुम भी श्रद्धाके साथ इस ब्रह्मात्मविद्याको धारण करो और स्वच्छन्दभावसे पृथ्वीमें विचरण करो। यह विद्या मनुष्योंकी समस्त वासनाओंको भस्म कर देनेवाली है॥ ४४॥✎ 1722

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1722 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मानस-पुत्र → मानसपुत्र

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