॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.87.41
द्युपतय एव ते न ययुरन्तमनन्ततया
त्वमपि यदन्तराण्डनिचया ननु सावरणाः।
ख इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय-
स्त्वयि हि फलन्त्यतन्निरसनेन भवन्निधनाः॥ ४१
dyupataya eva te na yayurantamanantatayā
tvamapi yadantarāṇḍanicayā nanu sāvaraṇāḥ|
kha iva rajāṃsi vānti vayasā saha yacchrutaya-
stvayi hi phalantyatannirasanena bhavannidhanāḥ|| 41
अर्थ
भगवन्! स्वर्गादि लोकोंके अधिपति इन्द्र, ब्रह्मा प्रभृति भी आपकी थाह—आपका पार न पा सके; और आश्चर्यकी बात तो यह है कि आप भी उसे नहीं जानते। क्योंकि जब अन्त है ही नहीं, तब कोई जानेगा कैसे? प्रभो! जैसे आकाशमें हवासे धूलके नन्हें-नन्हें कण उड़ते रहते हैं, वैसे ही आपमें कालके वेगसे अपनेसे उत्तरोत्तर दसगुने सात आवरणोंके सहित असंख्य ब्रह्माण्ड एक साथ ही घूमते रहते हैं। तब भला, आपकी सीमा कैसे मिले। हम श्रुतियाँ भी आपके स्वरूपका साक्षात् वर्णन नहीं कर सकतीं, आपके अतिरिक्त वस्तुओंका निषेध करते-करते अन्तमें अपना भी निषेध कर देती हैं और आपमें ही अपनी सत्ता खोकर सफल हो जाती हैं*॥ ४१॥
टिप्पणियाँ
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द्युपतयो विदुरन्तमनन्त ते न च भवान्न गिरः श्रुतिमौलयः।
त्वयि फलन्ति यतो नम इत्यतो जय जयेति भजे तव तत्पदम्॥ २८॥
हे अनन्त! ब्रह्मा आदि देवता आपका अन्त नहीं जानते, न आप ही जानते और न तो वेदोंकी मुकुटमणि उपनिषदें ही जानती हैं; क्योंकि आप अनन्त हैं। उपनिषदें ‘नमो नमः’, ‘जय हो, जय हो’ यह कहकर आपमें चरितार्थ होती हैं। इसलिये मैं भी ‘नमो नमः’, ‘जय हो’, ‘जय हो’ यही कहकर आपके चरण-कमलकी उपासना करता हूँ।