श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.87.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 87 · अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः

नृषु तव मायया भ्रमममीष्ववगत्य भृशं त्वयि सुधियोऽभवे दधति भावमनुप्रभवम्।

कथमनुवर्ततां भवभयं तव यद् भ्रुकुटिः सृजति मुहुस्त्रिणेमिरभवच्छरणेषु भयम्॥ ३२

nṛṣu tava māyayā bhramamamīṣvavagatya bhṛśaṃ tvayi sudhiyo'bhave dadhati bhāvamanuprabhavam|

kathamanuvartatāṃ bhavabhayaṃ tava yad bhrukuṭiḥ sṛjati muhustriṇemirabhavaccharaṇeṣu bhayam|| 32

अर्थ

भगवन्! सभी जीव आपकी मायासे भ्रममें भटक रहे हैं, अपनेको आपसे पृथक् मानकर जन्म-मृत्युका चक्कर काट रहे हैं। परन्तु बुद्धिमान् पुरुष इस भ्रमको समझ लेते हैं और सम्पूर्ण भक्तिभावसे आपकी शरण ग्रहण करते हैं, क्योंकि आप जन्म-मृत्युके चक्करसे छुड़ानेवाले हैं। यद्यपि शीत, ग्रीष्म और वर्षा—इन तीन भागोंवाला कालचक्र आपका भ्रूविलासमात्र है, वह सभीको भयभीत करता है, परन्तु वह उन्हींको बार-बार भयभीत करता है, जो आपकी शरण नहीं लेते। जो आपके शरणागत भक्त हैं, उन्हें भला, जन्म-मृत्युरूप संसारका भय कैसे हो सकता है?†॥ ३२॥

टिप्पणियाँ

  1. †

    संसारचक्रक्रकचैर्विदीर्णमुदीर्णनानाभवतापतप्तम् ।

    कथंचिदापन्‍नमिह प्रपन्‍नं त्‍वमुद्धर श्रीनृहरे नृलोकम् ॥ १९॥

    नृसिंह! यह जीव संसार-चक्रके आरेसे टुकड़े-टुकड़े हो रहा है और नाना प्रकारके सांसारिक तापोंकी धधकती हुई लपटोंसे झुलस रहा है। यह आपत्तिग्रस्त जीव किसी प्रकार आपकी कृपासे आपकी शरणमें आया है। आप इसका उद्धार कीजिये।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 680)

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