श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.87.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 87 · अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः

तुल्यश्रुततपःशीलास्तुल्यस्वीयारिमध्यमाः।

अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे॥ ११

tulyaśrutatapaḥśīlāstulyasvīyārimadhyamāḥ|

api cakruḥ pravacanamekaṃ śuśrūṣavo'pare|| 11

अर्थ

सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार—ये चारों भाई शास्त्रीय ज्ञान, तपस्या और शील-स्वभावमें समान हैं। उन लोगोंकी दृष्टिमें शत्रु, मित्र और उदासीन एक-से हैं। फिर भी उन्होंने अपनेमेंसे सनन्दनको तो वक्ता बना लिया और शेष भाई सुननेके इच्छुक बनकर बैठ गये॥ ११॥

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