॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.87.1
अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः
वेदस्तुति
परीक्षिदुवाच
ब्रह्मन् ब्रह्मण्यनिर्देश्ये निर्गुणे गुणवृत्तयः।
कथं चरन्ति श्रुतयः साक्षात् सदसतः परे॥ १
brahman brahmaṇyanirdeśye nirguṇe guṇavṛttayaḥ|
kathaṃ caranti śrutayaḥ sākṣāt sadasataḥ pare|| 1
अर्थ
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन्! ब्रह्म कार्य और कारणसे सर्वथा परे है। सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण उसमें हैं ही नहीं। मन और वाणीसे संकेतरूपमें भी उसका निर्देश नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर समस्त श्रुतियोंका विषय गुण ही है। (वे जिस विषयका वर्णन करती हैं उसके गुण, जाति, क्रिया अथवा रूढिका ही निर्देश करती हैं) ऐसी स्थितिमें श्रुतियाँ निर्गुण ब्रह्मका प्रतिपादन किस प्रकार करती हैं? क्योंकि निर्गुण वस्तुका स्वरूप तो उनकी पहुँचके परे है॥ १॥