अब अर्जुन केवल उसीका चिन्तन करने लगे और इस बातका अवसर ढूँढ़ने लगे कि इसे कब हर ले जाऊँ। सुभद्राको प्राप्त करनेकी उत्कट कामनासे उनका चित्त चक्कर काटने लगा, उन्हें तनिक भी शान्ति नहीं मिलती थी॥ ८॥
तां परं समनुध्यायन्नन्तरं प्रेप्सुरर्जुनः।
न लेभे शं भ्रमच्चित्तः कामेनातिबलीयसा॥ ८
अब अर्जुन केवल उसीका चिन्तन करने लगे और इस बातका अवसर ढूँढ़ने लगे कि इसे कब हर ले जाऊँ। सुभद्राको प्राप्त करनेकी उत्कट कामनासे उनका चित्त चक्कर काटने लगा, उन्हें तनिक भी शान्ति नहीं मिलती थी॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 661) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/86/8/