श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.58

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

स इत्थं प्रभुणाऽऽदिष्टः सहकृष्णान् द्विजोत्तमान्।

आराध्यैकात्मभावेन मैथिलश्‍चाप सद्गतिम्॥ ५८

sa itthaṃ prabhuṇā''diṣṭaḥ sahakṛṣṇān dvijottamān|

ārādhyaikātmabhāvena maithilaścāpa sadgatim|| 58

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका यह आदेश प्राप्त करके श्रुतदेवने भगवान् श्रीकृष्ण और उन ब्रह्मर्षियोंकी एकात्मभावसे आराधना की तथा उनकी कृपासे वे भगवत्स्वरूपको प्राप्त हो गये। राजा बहुलाश्‍वने भी वही गति प्राप्त की॥ ५८॥

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