श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.48

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

नमोऽस्तु तेऽध्यात्मविदां परात्मने

अनात्मने स्वात्मविभक्तमृत्यवे।

सकारणाकारणलिंगमीयुषे

स्वमाययासंवृतरुद्धदृष्टये ॥ ४८

namo'stu te'dhyātmavidāṃ parātmane

anātmane svātmavibhaktamṛtyave|

sakāraṇākāraṇaliṃgamīyuṣe

svamāyayāsaṃvṛtaruddhadṛṣṭaye || 48

अर्थ

प्रभो! जो लोग आत्मतत्त्वको जाननेवाले हैं, उनके आत्माके रूपमें ही आप स्थित हैं और जो शरीर आदिको ही अपना आत्मा मान बैठे हैं, उनके लिये आप अनात्माको प्राप्त होनेवाली मृत्युके रूपमें हैं। आप महत्तत्त्व आदि कार्यद्रव्य और प्रकृतिरूप कारणके नियामक हैं—शासक हैं। आपकी माया आपकी अपनी दृष्टिपर पर्दा नहीं डाल सकती, किन्तु उसने दूसरोंकी दृष्टिको ढक रखा है। आपको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ४८॥

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