श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.46

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

शृण्वतां गदतां शश्‍वदर्चतां त्वाभिवन्दताम्।

नृणां संवदतामन्तर्हृदि भास्यमलात्मनाम्॥ ४६

śṛṇvatāṃ gadatāṃ śaśvadarcatāṃ tvābhivandatām|

nṛṇāṃ saṃvadatāmantarhṛdi bhāsyamalātmanām|| 46

अर्थ

जो लोग सर्वदा आपकी लीलाकथाका श्रवण-कीर्तन तथा आपकी प्रतिमाओंका अर्चन-वन्दन करते हैं और आपसमें आपकी ही चर्चा करते हैं, उनका हृदय शुद्ध हो जाता है और आप उसमें प्रकाशित हो जाते हैं॥ ४६॥

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