श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

सूपविष्टान् कृतातिथ्याञ्छ्रुतदेव उपस्थितः।

सभार्यस्वजनापत्य उवाचाङ्‌घ्र्यभिमर्शनः॥ ४३✎ 2140

sūpaviṣṭān kṛtātithyāñchrutadeva upasthitaḥ|

sabhāryasvajanāpatya uvācāṅghryabhimarśanaḥ|| 43

अर्थ

जब सब लोग आतिथ्य स्वीकार करके आरामसे बैठ गये, तब श्रुतदेव अपने स्त्री-पुत्र तथा अन्य सम्बन्धियोंके साथ उनकी सेवामें उपस्थित हुए। वे भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका स्पर्श करते हुए कहने लगे॥ ४३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2140 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ङ्‌घ्रॺभिमर्श → ङ्‌घ्र्यभिमर्श

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