परीक्षित्! महान् सौभाग्यशाली श्रुतदेवने भगवान् और ऋषियोंके चरणोदकसे अपने घर और कुटुम्बियोंको सींच दिया। इस समय उनके सारे मनोरथ पूर्ण हो गये थे। वे हर्षातिरेकसे मतवाले हो रहे थे॥ ४०॥
तदम्भसा महाभाग आत्मानं सगृहान्वयम्।
स्नापयांचक्र उद्धर्षो लब्धसर्वमनोरथः॥ ४०
परीक्षित्! महान् सौभाग्यशाली श्रुतदेवने भगवान् और ऋषियोंके चरणोदकसे अपने घर और कुटुम्बियोंको सींच दिया। इस समय उनके सारे मनोरथ पूर्ण हो गये थे। वे हर्षातिरेकसे मतवाले हो रहे थे॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 664) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/86/40/