श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

कान्तिस्तेजः प्रभा सत्ता चन्द्रा‌ग्‍न्यर्कर्क्षविद्युताम्।

यत् स्थैर्यं भूभृतां भूमेर्वृत्तिर्गन्धोऽर्थतो भवान्॥ ७

kāntistejaḥ prabhā sattā candrāgnyarkarkṣavidyutām|

yat sthairyaṃ bhūbhṛtāṃ bhūmervṛttirgandho'rthato bhavān|| 7

अर्थ

प्रभो! चन्द्रमाकी कान्ति, अग्‍निका तेज, सूर्यकी प्रभा, नक्षत्र और विद्युत् आदिकी स्फुरणरूपसे सत्ता, पर्वतोंकी स्थिरता, पृथ्वीकी साधारणशक्तिरूप वृत्ति और गन्धरूप गुण—ये सब वास्तवमें तुम्हीं हो॥ ७॥

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