श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.57

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

तं दृष्ट्वा देवकी देवी मृतागमननिर्गमम्।

मेने सुविस्मिता मायां कृष्णस्य रचितां नृप॥ ५७

taṃ dṛṣṭvā devakī devī mṛtāgamananirgamam|

mene suvismitā māyāṃ kṛṣṇasya racitāṃ nṛpa|| 57

अर्थ

परीक्षित्! देवी देवकी यह देखकर अत्यन्त विस्मित हो गयीं कि मरे हुए बालक लौट आये और फिर चले भी गये। उन्होंने ऐसा निश्‍चय किया कि यह श्रीकृष्णका ही कोई लीला-कौशल है॥ ५७॥✎ 1719

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1719 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: असुर-योनिमें → असुरयोनिमें

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