श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

आसन् मरीचेः षट् पुत्रा ऊर्णायां प्रथमेऽन्तरे।

देवाः कं जहसुर्वीक्ष्य सुतां यभितुमुद्यतम्॥ ४७

āsan marīceḥ ṣaṭ putrā ūrṇāyāṃ prathame'ntare|

devāḥ kaṃ jahasurvīkṣya sutāṃ yabhitumudyatam|| 47

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘दैत्यराज! स्वायम्भुव मन्वन्तरमें प्रजापति मरीचिकी पत्‍नी ऊर्णाके गर्भसे छः पुत्र उत्पन्‍न हुए थे। वे सभी देवता थे। वे यह देखकर कि ब्रह्माजी अपनी पुत्रीसे समागम करनेके लिये उद्यत हैं, हँसने लगे॥ ४७॥✎ 1719

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1719 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: असुर-योनिमें → असुरयोनिमें

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