भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘दैत्यराज! स्वायम्भुव मन्वन्तरमें प्रजापति मरीचिकी पत्नी ऊर्णाके गर्भसे छः पुत्र उत्पन्न हुए थे। वे सभी देवता थे। वे यह देखकर कि ब्रह्माजी अपनी पुत्रीसे समागम करनेके लिये उद्यत हैं, हँसने लगे॥ ४७॥✎ 1719
आसन् मरीचेः षट् पुत्रा ऊर्णायां प्रथमेऽन्तरे।
देवाः कं जहसुर्वीक्ष्य सुतां यभितुमुद्यतम्॥ ४७
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘दैत्यराज! स्वायम्भुव मन्वन्तरमें प्रजापति मरीचिकी पत्नी ऊर्णाके गर्भसे छः पुत्र उत्पन्न हुए थे। वे सभी देवता थे। वे यह देखकर कि ब्रह्माजी अपनी पुत्रीसे समागम करनेके लिये उद्यत हैं, हँसने लगे॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 658) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/85/47/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)