श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

खं वायुर्ज्योतिरापो भूस्तत्कृतेषु यथाशयम्।

आविस्तिरोऽल्पभूर्येको नानात्वं यात्यसावपि॥ २५

khaṃ vāyurjyotirāpo bhūstatkṛteṣu yathāśayam|

āvistiro'lpabhūryeko nānātvaṃ yātyasāvapi|| 25

अर्थ

जैसे आकाश, वायु, अग्‍नि, जल और पृथ्वी—ये पंचमहाभूत अपने कार्य घट, कुण्डल आदिमें प्रकट-अप्रकट, बड़े-छोटे, अधिक-थोड़े, एक और अनेक-से प्रतीत होते हैं—परन्तु वास्तवमें सत्तारूपसे वे एक ही रहते हैं; वैसे ही आत्मामें भी उपाधियोंके भेदसे ही नानात्वकी प्रतीति होती है। इसलिये जो मैं हूँ, वही सब हैं—इस दृष्टिसे आपका कहना ठीक ही है॥ २५॥

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