॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.85.23
अहं यू१यमसावार्य इमे च द्वारकौकसः।
सर्वेऽप्येवं यदुश्रेष्ठ विमृश्याः सचराचरम्॥ २३
ahaṃ yūyamasāvārya ime ca dvārakaukasaḥ|
sarve'pyevaṃ yaduśreṣṭha vimṛśyāḥ sacarācaram|| 23
अर्थ
पिताजी! आपलोग, मैं, भैया बलरामजी, सारे द्वारकावासी, सम्पूर्ण चराचर जगत्—सब-के-सब आपने जैसा कहा, वैसे ही हैं, सबको ब्रह्मरूप ही समझना चाहिये॥ २३॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रियो ममाचार्य।