श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.66

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

नन्दस्तु सख्युः प्रियकृत् प्रेम्णा गोविन्दरामयोः।

अद्य श्‍व इति मासांस्त्रीन् यदुभिर्मानितोऽवसत्॥ ६६

nandastu sakhyuḥ priyakṛt premṇā govindarāmayoḥ|

adya śva iti māsāṃstrīn yadubhirmānito'vasat|| 66

अर्थ

नन्दजी अपने सखा वसुदेवजीको प्रसन्‍न करनेके लिये एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके प्रेमपाशमें बँधकर आज-कल करते-करते तीन महीनेतक वहीं रह गये। यदुवंशियोंने जीभर उनका सम्मान किया॥ ६६॥

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