नन्दजी अपने सखा वसुदेवजीको प्रसन्न करनेके लिये एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके प्रेमपाशमें बँधकर आज-कल करते-करते तीन महीनेतक वहीं रह गये। यदुवंशियोंने जीभर उनका सम्मान किया॥ ६६॥
नन्दस्तु सख्युः प्रियकृत् प्रेम्णा गोविन्दरामयोः।
अद्य श्व इति मासांस्त्रीन् यदुभिर्मानितोऽवसत्॥ ६६
नन्दजी अपने सखा वसुदेवजीको प्रसन्न करनेके लिये एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके प्रेमपाशमें बँधकर आज-कल करते-करते तीन महीनेतक वहीं रह गये। यदुवंशियोंने जीभर उनका सम्मान किया॥ ६६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.66 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 651) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/84/66/