श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.49

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

तस्यर्त्विजो महाराज रत्‍नकौशेयवाससः।

ससदस्या विरेजुस्ते यथा वृत्रहणोऽध्वरे॥ ४९

tasyartvijo mahārāja ratnakauśeyavāsasaḥ|

sasadasyā virejuste yathā vṛtrahaṇo'dhvare|| 49

अर्थ

महाराज! वसुदेवजीके ऋत्विज् और सदस्य रत्‍नजटित आभूषण तथा रेशमी वस्त्र धारण करके वैसे ही सुशोभित हुए, जैसे पहले इन्द्रके यज्ञमें हुए थे॥ ४९॥

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