श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

तमभ्यषिंचन् विधिवदक्तमभ्यक्तमृत्विजः।

पत्‍नीभिरष्टादशभिः सोमराजमिवोडुभिः॥ ४७

tamabhyaṣiṃcan vidhivadaktamabhyaktamṛtvijaḥ|

patnībhiraṣṭādaśabhiḥ somarājamivoḍubhiḥ|| 47

अर्थ

वसुदेवजीने पहले नेत्रोंमें अंजन और शरीरमें मक्खन लगा लिया; फिर उनकी देवकी आदि अठारह पत्‍नियोंके साथ उन्हें ऋत्विजोंने महाभिषेककी विधिसे वैसे ही अभिषेक कराया, जिस प्रकार प्राचीन कालमें नक्षत्रोंके साथ चन्द्रमाका अभिषेक हुआ था॥ ४७॥

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