श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

अयं स्वस्त्ययनः पन्था द्विजातेर्गृहमेधिनः।

यच्छ्रद्धयाऽऽप्तवि१त्तेन शुक्लेनेज्येत पूरुषः॥ ३७

ayaṃ svastyayanaḥ panthā dvijātergṛhamedhinaḥ|

yacchraddhayā''ptavittena śuklenejyeta pūruṣaḥ|| 37

अर्थ

अपने न्यायार्जित धनसे श्रद्धापूर्वक पुरुषोत्तमभगवान्‌की आराधना करना ही द्विजाति—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य गृहस्थके लिये परम कल्याणका मार्ग है॥ ३७॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    चित्ते०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 648)

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