श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

एवं त्वा नाममात्रेषु विषयेष्विन्द्रियेहया।

मायया विभ्रमच्चित्तो न वेद स्मृत्युपप्लवात्॥ २५

evaṃ tvā nāmamātreṣu viṣayeṣvindriyehayā|

māyayā vibhramaccitto na veda smṛtyupaplavāt|| 25

अर्थ

ठीक इसी प्रकार, जाग्रत्-अवस्थामें भी इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिरूप मायासे चित्त मोहित होकर नाममात्रके विषयोंमें भटकने लगता है। उस समय भी चित्तके चक्करसे विवेकशक्ति ढक जाती है और जीव यह नहीं जान पाता कि आप इस जाग्रत् संसारसे परे हैं॥ २५॥

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