श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

न यं विदन्त्यमी भूपा एकारामाश्‍च वृष्णयः।

मायाजवनिकाच्छन्‍नमात्मानं कालमीश्‍वरम्॥ २३

na yaṃ vidantyamī bhūpā ekārāmāśca vṛṣṇayaḥ|

māyājavanikācchannamātmānaṃ kālamīśvaram|| 23

अर्थ

ये सभामें बैठे हुए राजालोग और दूसरोंकी तो बात ही क्या, स्वयं आपके साथ आहार-विहार करनेवाले यदुवंशी लोग भी आपको वास्तवमें नहीं जानते; क्योंकि आपने अपने स्वरूपको—जो सबका आत्मा, जगत‍्का आदिकारण और नियन्ता है—मायाके परदेसे ढक रखा है॥ २३॥

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