॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.84.19
ब्रह्म ते हृदयं शुक्लं तपःस्वाध्यायसंयमैः।
यत्रोपलब्धं सद् व्यक्तमव्यक्तं च ततः परम्॥ १९
brahma te hṛdayaṃ śuklaṃ tapaḥsvādhyāyasaṃyamaiḥ|
yatropalabdhaṃ sad vyaktamavyaktaṃ ca tataḥ param|| 19
अर्थ
भगवन्! वेद आपका विशुद्ध हृदय है; तपस्या, स्वाध्याय, धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा उसीमें आपके साकार-निराकाररूप और दोनोंके अधिष्ठान-स्वरूप परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार होता है॥ १९॥