श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

ब्रह्म ते हृदयं शुक्लं तपःस्वाध्यायसंयमैः।

यत्रोपलब्धं सद् व्यक्तमव्यक्तं च ततः परम्॥ १९

brahma te hṛdayaṃ śuklaṃ tapaḥsvādhyāyasaṃyamaiḥ|

yatropalabdhaṃ sad vyaktamavyaktaṃ ca tataḥ param|| 19

अर्थ

भगवन्! वेद आपका विशुद्ध हृदय है; तपस्या, स्वाध्याय, धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा उसीमें आपके साकार-निराकाररूप और दोनोंके अधिष्ठान-स्वरूप परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार होता है॥ १९॥

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