श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

अनीह एतद् बहुधैक आत्मना

सृजत्यवत्यत्ति न बध्यते यथा।

भौमैर्हि भूमिर्बहुनामरूपिणी

अहो विभूम्‍नश्‍चरितं विडम्बनम्॥ १७

anīha etad bahudhaika ātmanā

sṛjatyavatyatti na badhyate yathā|

bhaumairhi bhūmirbahunāmarūpiṇī

aho vibhūmnaścaritaṃ viḍambanam|| 17

अर्थ

जैसे पृथ्वी अपने विकारों—वृक्ष, पत्थर, घट आदिके द्वारा बहुत-से नाम और रूप ग्रहण कर लेती है, वास्तवमें वह एक ही है, वैसे ही आप एक और चेष्टाहीन होनेपर भी अनेक रूप धारण कर लेते हैं और अपने-आपसे ही इस जगत‍्की रचना, रक्षा और संहार करते हैं। पर यह सब करते हुए भी इन कर्मोंसे लिप्त नहीं होते। जो सजातीय, विजातीय और स्वगत भेदशून्य एकरस अनन्त है, उसका यह चरित्र लीलामात्र नहीं तो और क्या है? धन्य है आपकी यह लीला!॥ १७॥

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