श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

सत्यभामोवाच

यो मे सनाभिवधतप्तहृदा ततेन

लिप्ताभिशापमपमार्ष्टुमुपाजहार।

जित्वर्क्षराजमथ रत्‍नमदात् स तेन

भीतः पितादिशत मां प्रभवेऽपि दत्ताम्॥ ९

yo me sanābhivadhataptahṛdā tatena

liptābhiśāpamapamārṣṭumupājahāra|

jitvarkṣarājamatha ratnamadāt sa tena

bhītaḥ pitādiśata māṃ prabhave'pi dattām|| 9

अर्थ

सत्यभामाने कहा—द्रौपदीजी! मेरे पिताजी अपने भाई प्रसेनकी मृत्युसे बहुत दुःखी हो रहे थे, अतः उन्होंने उनके वधका कलंक भगवान्‌पर ही लगाया। उस कलंकको दूर करनेके लिये भगवान्‌ने ऋक्षराज जाम्बवान्पर विजय प्राप्त की और वह रत्‍न लाकर मेरे पिताको दे दिया। अब तो मेरे पिताजी मिथ्या कलंक लगानेके कारण डर गये। अतः यद्यपि वे दूसरेको मेरा वाग्दान कर चुके थे, फिर भी उन्होंने मुझे स्यमन्तकमणिके साथ भगवान्‌के चरणोंमें ही समर्पित कर दिया॥ ९॥

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