पर रानीजी! दारुकने सोनेके साज-सामानसे लदे हुए रथको सब राजाओंके सामने ही द्वारकाके लिये हाँक दिया, जैसे कोई सिंह हरिनोंके बीचसे अपना भाग ले जाय॥ ३३॥
दारुकश्चोदयामास कांचनोपस्करं रथम्।
मिषतां भूभुजां राज्ञि मृगाणां मृगराडिव॥ ३३
पर रानीजी! दारुकने सोनेके साज-सामानसे लदे हुए रथको सब राजाओंके सामने ही द्वारकाके लिये हाँक दिया, जैसे कोई सिंह हरिनोंके बीचसे अपना भाग ले जाय॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.83.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 641) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/83/33/