श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

राजन्येषु निवृत्तेषु भ‌ग्‍नमानेषु मानिषु।

भगवान् धनुरादाय सज्यं कृत्वाथ लीलया॥ २५

rājanyeṣu nivṛtteṣu bhagnamāneṣu māniṣu|

bhagavān dhanurādāya sajyaṃ kṛtvātha līlayā|| 25

अर्थ

रानीजी! इस प्रकार बड़े-बड़े अभिमानियोंका मान मर्दन हो गया। अधिकांश नरपतियोंने मुझे पानेकी लालसा एवं साथ-ही-साथ लक्ष्यवेधकी चेष्टा भी छोड़ दी। तब भगवान्‌ने धनुष उठाकर खेल-खेलमें—अनायास ही उसपर डोरी चढ़ा दी, बाण साधा और जलमें केवल एक बार मछलीकी परछाईं देखकर बाण मारा तथा उसे नीचे गिरा दिया। उस समय ठीक दोपहर हो रहा था, सर्वार्थसाधक ‘अभिजित्’ नामक मुहूर्त बीत रहा था॥ २५-२६॥

यह अर्थ श्लोक 25–26 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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