श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

आदाय व्यसृजन् केचित् सज्यं कर्तुमनीश्‍वराः।

आकोटि ज्यां समुत्कृष्य पेतुरेकेऽमुना हताः॥ २२

ādāya vyasṛjan kecit sajyaṃ kartumanīśvarāḥ|

ākoṭi jyāṃ samutkṛṣya petureke'munā hatāḥ|| 22

अर्थ

उनमेंसे कितने ही राजा तो धनुषपर ताँत भी न चढ़ा सके। उन्होंने धनुषको ज्यों-का-त्यों रख दिया। कइयोंने धनुषकी डोरीको एक सिरेसे बाँधकर दूसरे सिरेतक खींच तो लिया, परन्तु वे उसे दूसरे सिरेसे बाँध न सके, उसका झटका लगनेसे गिर पड़े॥ २२॥✎ 1716

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1716 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्वयंवर-सभामें → स्वयंवरसभामें

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