श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.46

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

अहं हि सर्वभूतानामादिरन्तोऽन्तरं बहिः।

भौतिकानां यथा खं वार्भूर्वायुर्ज्योतिरंगनाः॥ ४६

ahaṃ hi sarvabhūtānāmādiranto'ntaraṃ bahiḥ|

bhautikānāṃ yathā khaṃ vārbhūrvāyurjyotiraṃganāḥ|| 46

अर्थ

प्यारी गोपियो! जैसे घट, पट आदि जितने भी भौतिक पदार्थ हैं, उनके आदि, अन्त और मध्यमें, बाहर और भीतर, उनके मूल कारण पृथ्वी, जल, वायु, अग्‍नि तथा आकाश ही ओतप्रोत हो रहे हैं, वैसे ही जितने भी पदार्थ हैं, उनके पहले, पीछे, बीचमें, बाहर और भीतर केवल मैं-ही-मैं हूँ॥ ४६॥

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