मेरी प्यारी गोपियो! कहीं तुमलोगोंके मनमें यह आशंका तो नहीं हो गयी है कि मैं अकृतज्ञ हूँ और ऐसा समझकर तुमलोग हमसे बुरा तो नहीं मानने लगी हो? निस्सन्देह भगवान् ही प्राणियोंके संयोग और वियोगके कारण हैं॥ ४३॥
अप्यवध्यायथास्मान् स्विदकृतज्ञाविशंकया।
नूनं भूतानि भगवान् युनक्ति वियुनक्ति च॥ ४३
मेरी प्यारी गोपियो! कहीं तुमलोगोंके मनमें यह आशंका तो नहीं हो गयी है कि मैं अकृतज्ञ हूँ और ऐसा समझकर तुमलोग हमसे बुरा तो नहीं मानने लगी हो? निस्सन्देह भगवान् ही प्राणियोंके संयोग और वियोगके कारण हैं॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.82.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 635) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/43/