श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

अप्यवध्यायथास्मान् स्विदकृतज्ञाविशंकया।

नूनं भूतानि भगवान् युनक्ति वियुनक्ति च॥ ४३

apyavadhyāyathāsmān svidakṛtajñāviśaṃkayā|

nūnaṃ bhūtāni bhagavān yunakti viyunakti ca|| 43

अर्थ

मेरी प्यारी गोपियो! कहीं तुमलोगोंके मनमें यह आशंका तो नहीं हो गयी है कि मैं अकृतज्ञ हूँ और ऐसा समझकर तुमलोग हमसे बुरा तो नहीं मानने लगी हो? निस्सन्देह भगवान् ही प्राणियोंके संयोग और वियोगके कारण हैं॥ ४३॥

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