॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.82.25
कुन्तिभोजो विराटश्च भीष्मको नग्नजिन्महान्।
पुरुजिद् द्रुपदः शल्यो१ धृष्टकेतुः सकाशिराट्॥ २५
kuntibhojo virāṭaśca bhīṣmako nagnajinmahān|
purujid drupadaḥ śalyo dhṛṣṭaketuḥ sakāśirāṭ|| 25
अर्थ
परीक्षित्! भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र, दुर्योधनादि पुत्रोंके साथ गान्धारी, पत्नियोंके सहित युधिष्ठिर आदि पाण्डव, कुन्ती, सृंजय, विदुर, कृपाचार्य, कुन्तिभोज, विराट, भीष्मक, महाराज नग्नजित्, पुरुजित्, द्रुपद, शल्य, धृष्टकेतु, काशीनरेश, दमघोष, विशालाक्ष, मिथिलानरेश, मद्रनरेश, केकयनरेश, युधामन्यु, सुशर्मा, अपने पुत्रोंके साथ बाह्लीक और दूसरे भी युधिष्ठिरके अनुयायी नृपति भगवान् श्रीकृष्णका परम सुन्दर श्रीनिकेतन विग्रह और उनकी रानियोंको देखकर अत्यन्त विस्मित हो गये॥ २४—२७॥
टिप्पणियाँ
- १
शैव्यो धृष्टकेतुश्च काशि०।