श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

मत्स्योशीनरकौसल्यविदर्भकुरुसृंजयान् ।

काम्बोजकैकयान् मद्रान् कुन्तीनानर्तकेरलान्॥ १३

matsyośīnarakausalyavidarbhakurusṛṃjayān |

kāmbojakaikayān madrān kuntīnānartakeralān|| 13

अर्थ

वहाँ मत्स्य, उशीनर, कोसल, विदर्भ, कुरु, सृंजय, काम्बोज, कैकय, मद्र, कुन्ति, आनर्त, केरल एवं दूसरे अनेकों देशोंके—अपने पक्षके तथा शत्रुपक्षके—सैकड़ों नरपति आये हुए थे। परीक्षित्! इनके अतिरिक्त यदुवंशियोंके परम हितैषी बन्धु नन्द आदि गोप तथा भगवान्‌के दर्शनके लिये चिरकालसे उत्कण्ठित गोपियाँ भी वहाँ आयी हुई थीं। यादवोंने इन सबको देखा॥ १३-१४॥

यह अर्थ श्लोक 13–14 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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