श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.81.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · अथैकाशीतितमोऽध्यायः

तस्य वै देवदेवस्य हरेर्यज्ञपतेः प्रभोः।

ब्राह्मणाः प्रभवो दैवं न तेभ्यो विद्यते परम्॥ ३९

tasya vai devadevasya hareryajñapateḥ prabhoḥ|

brāhmaṇāḥ prabhavo daivaṃ na tebhyo vidyate param|| 39

अर्थ

प्रिय परीक्षित्! देवताओंके भी आराध्यदेव भक्त-भयहारी यज्ञपति सर्वशक्तिमान् भगवान् स्वयं ब्राह्मणोंको अपना प्रभु, अपना इष्टदेव मानते हैं। इसलिये ब्राह्मणोंसे बढ़कर और कोई भी प्राणी जगत‍्में नहीं है॥ ३९॥

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