॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.81.22
विचित्रोपवनोद्यानैः कूजद्द्विजकुलाकुलैः।
प्रोत्फुल्लकुमुदाम्भोजकह्लारोत्पलवारिभिः॥ २२
vicitropavanodyānaiḥ kūjaddvijakulākulaiḥ|
protphullakumudāmbhojakahlārotpalavāribhiḥ|| 22
अर्थ
इस प्रकार मन-ही-मन विचार करते-करते ब्राह्मणदेवता अपने घरके पास पहुँच गये। वे वहाँ क्या देखते हैं कि सब-का-सब स्थान सूर्य, अग्नि और चन्द्रमाके समान तेजस्वी रत्ननिर्मित महलोंसे घिरा हुआ है। ठौर-ठौर चित्र-विचित्र उपवन और उद्यान बने हुए हैं तथा उनमें झुंड-के-झुंड रंग-बिरंगे पक्षी कलरव कर रहे हैं। सरोवरोंमें कुमुदिनी तथा श्वेत, नील और सौगन्धिक—भाँति-भाँतिके कमल खिले हुए हैं; सुन्दर-सुन्दर स्त्री-पुरुष बन-ठनकर इधर-उधर विचर रहे हैं। उस स्थानको देखकर ब्राह्मणदेवता सोचने लगे—‘मैं यह क्या देख रहा हूँ? यह किसका स्थान है? यदि यह वही स्थान है, जहाँ मैं रहता था तो यह ऐसा कैसे हो गया’॥ २१—२३॥