yad vai viśuddhabhāvena sarvārthātmārpaṇaṃ gurau|| 41
अर्थ
गुरुके ऋणसे मुक्त होनेके लिये सत्-शिष्योंका इतना ही कर्तव्य है कि वे विशुद्ध भावसे अपना सब कुछ और शरीर भी गुरुदेवकी सेवामें समर्पित कर दें॥ ४१॥
एतदेव हि सच्छिष्यैः कर्तव्यं गुरुनिष्कृतम्।
यद् वै विशुद्धभावेन सर्वार्थात्मार्पणं गुरौ॥ ४१
गुरुके ऋणसे मुक्त होनेके लिये सत्-शिष्योंका इतना ही कर्तव्य है कि वे विशुद्ध भावसे अपना सब कुछ और शरीर भी गुरुदेवकी सेवामें समर्पित कर दें॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 624) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/41/