श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

योऽसौ त्रिलोकगुरुणा श्रीनिवासेन सम्भृतः।

पर्यंकस्थां श्रियं हित्वा परिष्वक्तोऽग्रजो यथा॥ २६

yo'sau trilokaguruṇā śrīnivāsena sambhṛtaḥ|

paryaṃkasthāṃ śriyaṃ hitvā pariṣvakto'grajo yathā|| 26

अर्थ

वे आपसमें कहने लगीं—‘इस नंग-धड़ंग, निर्धन, निन्दनीय और निकृष्ट भिखमंगेने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है, जिससे त्रिलोकी-गुरु श्रीनिवास श्रीकृष्ण स्वयं इसका आदर-सत्कार कर रहे हैं। देखो तो सही, इन्होंने अपने पलंगपर सेवा करती हुई स्वयं लक्ष्मीरूपिणी रुक्मिणीजीको छोड़कर इस ब्राह्मणको अपने बड़े भाई बलरामजीके समान हृदयसे लगाया है’॥ २५-२६॥

यह अर्थ श्लोक 25–26 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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