श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

धूपैः सुरभिभिर्मित्रं प्रदीपावलिभिर्मुदा।

अर्चित्वाऽऽवेद्य ताम्बूलं गां च स्वागतमब्रवीत्॥ २२

dhūpaiḥ surabhibhirmitraṃ pradīpāvalibhirmudā|

arcitvā''vedya tāmbūlaṃ gāṃ ca svāgatamabravīt|| 22

अर्थ

फिर उन्होंने बड़े आनन्दसे सुगन्धित धूप और दीपावलीसे अपने मित्रकी आरती उतारी। इस प्रकार पूजा करके पान एवं गाय देकर मधुर वचनोंसे ‘भले पधारे’ ऐसा कहकर उनका स्वागत किया॥ २२॥

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