श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

को नु श्रुत्वासकृद् ब्रह्मन्‍नुत्तमश्‍लोकसत्कथाः।

विरमेत विशेषज्ञो विषण्णः काममार्गणैः॥ २

ko nu śrutvāsakṛd brahmannuttamaślokasatkathāḥ|

virameta viśeṣajño viṣaṇṇaḥ kāmamārgaṇaiḥ|| 2

अर्थ

ब्रह्मन्! यह जीव विषय-सुखको खोजते-खोजते अत्यन्त दुःखी हो गया है। वे बाणकी तरह इसके चित्तमें चुभते रहते हैं। ऐसी स्थितिमें ऐसा कौन-सा रसिक—रसका विशेषज्ञ पुरुष होगा, जो बार-बार पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णकी मंगलमयी लीलाओंका श्रवण करके भी उनसे विमुख होना चाहेगा॥ २॥

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