॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.8.41
अथो यथावन्न वितर्कगोचरं
चेतोमनःकर्मवचोभिरंजसा ।
यदाश्रयं येन यतः प्रतीयते
सुदुर्विभाव्यं प्रणतास्मि तत्पदम्॥ ४१
atho yathāvanna vitarkagocaraṃ
cetomanaḥkarmavacobhiraṃjasā |
yadāśrayaṃ yena yataḥ pratīyate
sudurvibhāvyaṃ praṇatāsmi tatpadam|| 41
अर्थ
‘जो चित्त, मन, कर्म और वाणीके द्वारा ठीक-ठीक तथा सुगमतासे अनुमानके विषय नहीं होते, यह सारा विश्व जिनके आश्रित है, जो इसके प्रेरक हैं और जिनकी सत्तासे ही इसकी प्रतीति होती है, जिनका स्वरूप सर्वथा अचिन्त्य है—उन प्रभुको मैं प्रणाम करती हूँ॥ ४१॥