वे सोचने लगीं कि ‘यह कोई स्वप्न है या भगवान्की माया? कहीं मेरी बुद्धिमें ही तो कोई भ्रम नहीं हो गया है? सम्भव है, मेरे इस बालकमें ही कोई जन्मजात योगसिद्धि हो’॥ ४०॥
किं स्वप्न एतदुत देवमाया
किं वा मदीयो बत बुद्धिमोहः।
अथो अमुष्यैव ममार्भकस्य
यः कश्चनौत्पत्तिक आत्मयोगः॥ ४०
वे सोचने लगीं कि ‘यह कोई स्वप्न है या भगवान्की माया? कहीं मेरी बुद्धिमें ही तो कोई भ्रम नहीं हो गया है? सम्भव है, मेरे इस बालकमें ही कोई जन्मजात योगसिद्धि हो’॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.8.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 179) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/8/40/