उनके बचपनकी चंचलताएँ बड़ी ही अनोखी होती थीं। गोपियोंको तो वे बड़ी ही सुन्दर और मधुर लगतीं। एक दिन सब-की-सब इकट्ठी होकर नन्दबाबाके घर आयीं और यशोदा माताको सुना-सुनाकर कन्हैयाके करतूत कहने लगीं॥ २८॥✎ 1656
कृष्णस्य गोप्यो रुचिरं वीक्ष्य कौमारचापलम्।
शृण्वत्याः किल तन्मातुरिति होचुः समागताः॥ २८
उनके बचपनकी चंचलताएँ बड़ी ही अनोखी होती थीं। गोपियोंको तो वे बड़ी ही सुन्दर और मधुर लगतीं। एक दिन सब-की-सब इकट्ठी होकर नन्दबाबाके घर आयीं और यशोदा माताको सुना-सुनाकर कन्हैयाके करतूत कहने लगीं॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.8.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 172) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/8/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)