॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.8.26
कालेनाल्पेन राजर्षे रामः कृष्णश्च गोकुले।
अघृष्टजानुभिः पद्भिर्विचक्रमतुरंजसा॥ २६
kālenālpena rājarṣe rāmaḥ kṛṣṇaśca gokule|
aghṛṣṭajānubhiḥ padbhirvicakramaturaṃjasā|| 26
अर्थ
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जब श्यामसुन्दर घुटनोंका सहारा लिये बिना चलने लगे, तब वे अपने घरमें अनेकों प्रकारकी कौतुकमयी लीला करने लगे—
शून्ये चोरयतः स्वयं निजगृहे हैयंगवीनं मणिस्तम्भे स्वप्रतिबिम्बमीक्षितवतस्तेनैव सार्द्धं भिया।
भ्रातर्मा वद मातरं मम समो भागस्तवापीहितो भुङ्क्ष्वेत्यालपतो हरेः कलवचो मात्रा रहः श्रूयते॥
एक दिन साँवरे-सलोने व्रजराजकुमार श्रीकन्हैयालालजी अपने सूने घरमें स्वयं ही माखन चुरा रहे थे । उनकी दृष्टि मणिके खम्भेमें पड़े हुए अपने प्रतिविम्बपर पड़ी। अब तो वे डर गये। अपने प्रतिविम्बसे बोले—‘अरे भैया! मेरी मैयासे कहियो मत। तेरा भाग भी मेरे बराबर ही मुझे स्वीकार है; ले, खा। खा ले, भैया!’ यशोदा माता अपने लालाकी तोतली बोली सुन रही थीं।
उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ, वे घरमें भीतर घुस आयीं। माताको देखते ही श्रीकृष्णने अपने प्रतिविम्बको दिखाकर बात बदल दी—
मातः क एष नवनीतमिदं त्वदीयं लोभेन चोरयितुमद्य गृहं प्रविष्टः।
मद्वारणं न मनुते मयि रोषभाजि रोषं तनोति न हि मे नवनीतलोभः॥
‘मैया! मैया! यह कौन है? लोभवश तुम्हारा माखन चुरानेके लिये आज घरमें घुस आया है। मैं मना करता हूँ तो मानता नहीं है और मैं क्रोध करता हूँ तो यह भी क्रोध करता है। मैया! तुम कुछ और मत सोचना। मेरे मनमें माखनका तनिक भी लोभ नहीं है।’
अपने दुध-मुँहे शिशुकी प्रतिभा देखकर मैया वात्सल्य-स्नेहके आनन्दमें मग्न हो गयीं।
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एक दिन श्यामसुन्दर माताके बाहर जानेपर घरमें ही माखन-चोरी कर रहे थे। इतनेमें ही दैववश यशोदाजी लौट आयीं और अपने लाड़ले लालको न देखकर पुकारने लगीं—
कृष्ण! क्वासि करोषि किं पितरिति श्रुत्वैव मातुर्वचः साशंकं नवनीतचौर्यविरतो विश्रभ्य तामब्रवीत्।
मातः कंकणपद्मरागमहसा पाणिर्ममातप्यते तेनायं नवनीतभाण्डविवरे विन्यस्य निर्वापितः॥
‘कन्हैया! कन्हैया! अरे ओ मेरे बाप! कहाँ है, क्या कर रहा है?’ माताकी यह बात सुनते ही माखनचोर श्रीकृष्ण डर गये और माखन-चोरीसे अलग हो गये। फिर थोड़ी देर चुप रहकर यशोदाजीसे बोले—‘मैया, री मैया! यह जो तुमने मेरे कंकणमें पद्मराग जड़ा दिया है, इसकी लपटसे मेरा हाथ जल रहा था। इसीसे मैंने इसे माखनके मटकेमें डालकर बुझाया था।’
माता यह मधुर-मधुर कन्हैयाकी तोतली बोली सुनकर मुग्ध हो गयीं और ‘आओ बेटा!’ ऐसा कहकर लालाको गोदमें उठा लिया और प्यारसे चूमने लगीं।
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क्षुण्णाभ्यां करकुड्मलेन विगलद्वाष्पाम्बुदृग्भ्यां रुदन् हुं हुं हूमिति रुद्धकण्ठकुहरादस्पष्टवाग्विभ्रमः।
मात्रासौ नवनीतचौर्यकुतुके प्राग्भर्त्सितः स्वांचलेनामृज्यास्य मुखं तवैतदखिलं वत्सेति कण्ठे कृतः॥
एक दिन माताने माखनचोरी करनेपर श्यामसुन्दरको धमकाया, डाँटा-फटकारा। बस, दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी झड़ी लग गयी। कर-कमलसे आँखें मलने लगे। ऊँ-ऊँ-ऊँ करके रोने लगे। गला रुँध गया। मुँहसे बोला नहीं जाता था। बस, माता यशोदाका धैर्य टूट गया। अपने आँचलसे अपने लाला कन्हैयाका मुँह पोंछा और बड़े प्यारसे गले लगाकर बोलीं—‘लाला! यह सब तुम्हारा ही है, यह चोरी नहीं है।’
एक दिनकी बात है—पूर्णचन्द्रकी चाँदनीसे मणिमय आँगन धुल गया था। यशोदा मैयाके साथ गोपियोंकी गोष्ठी जुड़ रही थी। वहीं खेलते-खेलते कृष्णचन्द्रकी दृष्टि चन्द्रमापर पड़ी। उन्होंने पीछेसे आकर यशोदा मैयाका घूँघट उतार लिया। और अपने कोमल करोंसे उनकी चोटी खोलकर खींचने लगे और बार-बार पीठ थपथपाने लगे। ‘मैं लूँगा, मैं लूँगा’—तोतली बोलीसे इतना ही कहते। जब मैयाकी समझमें बात नहीं आयी, तब उसने स्नेहार्द्र दृष्टिसे पास बैठी ग्वालिनोंकी ओर देखा। अब वे विनयसे, प्यारसे फुसलाकर श्रीकृष्णको अपने पास ले आयीं और बोलीं—‘लालन! तुम क्या चाहते हो, दूध!’ श्रीकृष्ण-‘ना’। ‘क्या बढ़िया दही?’ ‘ना’। ‘क्या खुरचन?’ ‘ना’। ‘मलाई?’ ‘ना’। ‘ताजा माखन? ‘ना’ ग्वालिनोंने कहा—‘बेटा! रूठो मत, रोओ मत। जो माँगोगे सो देंगी।’ श्रीकृष्णने धीरेसे कहा—‘घरकी वस्तु नहीं चाहिये’ और अँगुली उठाकर चन्द्रमाकी ओर संकेत कर दिया। गोपियाँ बोलीं—‘ओ मेरे बाप! यह कोई माखनका लौंदा थोड़े ही है? हाय! हाय! हम यह कैसे देंगी? यह तो प्यारा-प्यारा हंस आकाशके सरोवरमें तैर रहा है।’ श्रीकृष्णने कहा—‘मैं भी तो खेलनेके लिये इस हंसको ही माँग रहा हूँ, शीघ्रता करो। पार जानेके पूर्व ही मुझे ला दो।’
अब और भी मचल गये। धरतीपर पाँव पीट-पीटकर और हाथोंसे गला पकड़-पकड़कर ‘दो-दो’ कहने लगे और पहलेसे भी अधिक रोने लगे। दूसरी गोपियोंने कहा—‘बेटा! राम-राम। इन्होंने तुमको बहला दिया है। यह राजहंस नहीं है, यह तो आकाशमें ही रहनेवाला चन्द्रमा है।’ श्रीकृष्ण हठ कर बैठे—‘मुझे तो यही दो; मेरे मनमें इसके साथ खेलनेकी बड़ी लालसा है। अभी दो, अभी दो। ‘जब बहुत रोने लगे, तब यशोदा माताने गोदमें उठा लिया और प्यार करके बोलीं—‘मेरे प्राण! न यह राजहंस है और न तो चन्द्रमा। है यह माखन ही, परन्तु तुमको देने योग्य नहीं है। देखो, इसमें वह काला-काला विष लगा हुआ है। इससे बढ़िया होनेपर भी इसे कोई नहीं खाता है।’ श्रीकृष्णने कहा—‘मैया! मैया! इसमें विष कैसे लग गया।’ बात बदल गयी। मैयाने गोदमें लेकर मधुर-मधुर स्वरसे कथा सुनाना प्रारम्भ किया। मा-बेटेमें प्रश्नोत्तर होने लगे।
यशोदा—‘लाला! एक क्षीरसागर है।’
श्रीकृष्ण—‘मैया! वह कैसा है।’
यशोदा—‘बेटा! यह जो तुम दूध देख रहे हो, इसीका एक समुद्र है।’
श्रीकृष्ण—‘मैया! कितनी गायोंने दूध दिया होगा जब समुद्र बना होगा।
यशोदा—‘कन्हैया! वह गायका दूध नहीं है।’
श्रीकृष्ण—‘अरी मैया! तू मुझे बहला रही है, भला बिना गायके दूध कैसे?’
यशोदा—‘वत्स! जिसने गायोंमें दूध बनाया है, वह गायके बिना भी दूध बना सकता है।’
श्रीकृष्ण—‘मैया! वह कौन है?’
यशोदा—‘वह भगवान् हैं; परन्तु अग (उनके पास कोई जा नहीं सकता। अथवा ‘ग’ कार रहित) हैं।’
श्रीकृष्ण—‘अच्छा ठीक है, आगे कहो।’
यशोदा—‘एक बार देवता और दैत्योंमें लड़ाई हुई। असुरोंको मोहित करनेके लिये भगवान्ने क्षीरसागरको मथा। मंदराचलकी रई बनी। वासुकि नागकी रस्सी। एक ओर देवता लगे, दूसरी ओर दानव।’
श्रीकृष्ण—‘जैसे गोपियाँ दही मथती हैं, क्यों मैया?’
यशोदा—‘हाँ बेटा! उसीसे कालकूट नामका विष पैदा हुआ।’
श्रीकृष्ण—‘मैया! विष तो साँपोंमें होता है, दूधमें कैसे निकला?’
यशोदा—‘बेटा! जब शंकर भगवान्ने वही विष पी लिया, तब उसकी जो फुइयाँ धरतीपर गिर पड़ीं, उन्हें पीकर साँप विषधर हो गये। सो बेटा! भगवान्की ही ऐसी कोई लीला है, जिससे दूधमेंसे विष निकला।’
श्रीकृष्ण—‘अच्छा मैया! यह तो ठीक है।’
यशोदा—‘बेटा! (चन्द्रमाकी ओर दिखाकर) यह मक्खन भी उसीसे निकला है। इसलिये थोड़ा-सा विष इसमें भी लग गया। देखो, देखो, इसीको लोग कलंक कहते हैं। सो मेरे प्राण! तुम घरका ही मक्खन खाओ।’
कथा सुनते-सुनते श्यामसुन्दरकी आँखोंमें नींद आ गयी और मैयाने उन्हें पलंगपर सुला दिया।