॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.79.6
सोऽपतद् भुवि निर्भिन्नललाटोऽसृक् समुत्सृजन्।
मुंचन्नार्तस्वरं शैलो यथा वज्रहतोऽरुणः॥ ६
so'patad bhuvi nirbhinnalalāṭo'sṛk samutsṛjan|
muṃcannārtasvaraṃ śailo yathā vajrahato'ruṇaḥ|| 6
अर्थ
बलरामजीने आकाशमें विचरनेवाले बल्वल दैत्यको अपने हलके अगले भागसे खींचकर उस ब्रह्मद्रोहीके सिरपर बड़े क्रोधसे एक मूसल कसकर जमाया, जिससे उसका ललाट फट गया और वह खून उगलता तथा आर्तस्वरसे चिल्लाता हुआ धरतीपर गिर पड़ा, ठीक वैसे ही जैसे वज्रकी चोट खाकर गेरू आदिसे लाल हुआ कोई पहाड़ गिर पड़ा हो॥ ५-६॥