परीक्षित्! बलरामजीकी बात दोनोंके लिये हितकर थी। परन्तु उन दोनोंका वैरभाव इतना दृढ़मूल हो गया था कि उन्होंने बलरामजीकी बात न मानी। वे एक-दूसरेकी कटुवाणी और दुर्व्यवहारोंका स्मरण करके उन्मत्त-से हो रहे थे॥ २८॥
न तद्वाक्यं जगृहतुर्बद्धवैरौ नृपार्थवत्।
अनुस्मरन्तावन्योन्यं दुरुक्तं दुष्कृतानि च॥ २८
परीक्षित्! बलरामजीकी बात दोनोंके लिये हितकर थी। परन्तु उन दोनोंका वैरभाव इतना दृढ़मूल हो गया था कि उन्होंने बलरामजीकी बात न मानी। वे एक-दूसरेकी कटुवाणी और दुर्व्यवहारोंका स्मरण करके उन्मत्त-से हो रहे थे॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.79.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 618) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/79/28/