सूतजीके मरते ही सब ऋषि-मुनि हाय-हाय करने लगे, सबके चित्त खिन्न हो गये। उन्होंने देवाधिदेव भगवान् बलरामजीसे कहा—‘प्रभो! आपने यह बहुत बड़ा अधर्म किया॥ २९॥
हाहेति वादिनः सर्वे मुनयः खिन्नमानसाः।
ऊचुः संकर्षणं देवमधर्मस्ते कृतः प्रभो॥ २९
सूतजीके मरते ही सब ऋषि-मुनि हाय-हाय करने लगे, सबके चित्त खिन्न हो गये। उन्होंने देवाधिदेव भगवान् बलरामजीसे कहा—‘प्रभो! आपने यह बहुत बड़ा अधर्म किया॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.78.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 613) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/78/29/