श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.78.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 78 · अथाष्टसप्ततितमोऽध्यायः

एकः पदातिः संक्रुद्धो गदापाणिः प्रकम्पयन्।

पद‍्भ्यामिमां महाराज महासत्त्वो व्यदृश्यत॥ २

ekaḥ padātiḥ saṃkruddho gadāpāṇiḥ prakampayan|

padbhyāmimāṃ mahārāja mahāsattvo vyadṛśyata|| 2

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शिशुपाल, शाल्व और पौण्ड्रकके मारे जानेपर उनकी मित्रताका ऋण चुकानेके लिये मूर्ख दन्तवक्त्र अकेला ही पैदल युद्धभूमिमें आ धमका। वह क्रोधके मारे आग-बबूला हो रहा था। शस्त्रके नामपर उसके हाथमें एकमात्र गदा थी। परन्तु परीक्षित्! लोगोंने देखा, वह इतना शक्तिशाली है कि उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी हिल रही है॥ १-२॥

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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