श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.77.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 77 · अथ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः

ततो मुहूर्तं प्रकृतावुपप्लुतः स्वबोध आस्ते स्वजनानुषंगतः।

महानुभावस्तदबुद्ध्यदासुरीं मायां स शाल्वप्रसृतां मयोदिताम्॥ २८

tato muhūrtaṃ prakṛtāvupaplutaḥ svabodha āste svajanānuṣaṃgataḥ|

mahānubhāvastadabuddhyadāsurīṃ māyāṃ sa śālvaprasṛtāṃ mayoditām|| 28

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण स्वयंसिद्ध ज्ञानस्वरूप और महानुभाव हैं। वे यह घटना देखकर दो घड़ीके लिये अपने स्वजन वसुदेवजीके प्रति अत्यन्त प्रेम होनेके कारण साधारण पुरुषोंके समान शोकमें डूब गये। परन्तु फिर वे जान गये कि यह तो शाल्वकी फैलायी हुई आसुरी माया ही है, जो उसे मय दानवने बतलायी थी॥ २८॥

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