श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.76.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 76 · अथ षट्सप्ततितमोऽध्यायः

शाल्वानीकपशस्त्रौघैर्वृष्णिवीरा भृशार्दिताः।

न तत्यजू रणं स्वं स्वं लोकद्व१यजिगीषवः॥ २५

śālvānīkapaśastraughairvṛṣṇivīrā bhṛśārditāḥ|

na tatyajū raṇaṃ svaṃ svaṃ lokadvayajigīṣavaḥ|| 25

अर्थ

परीक्षित्! शाल्वके सेनापतियोंने भी यदुवंशियोंपर खूब शस्त्रोंकी वर्षा कर रखी थी, इससे वे अत्यन्त पीड़ित थे; परन्तु उन्होंने अपना-अपना मोर्चा छोड़ा नहीं। वे सोचते थे कि मरेंगे तो परलोक बनेगा और जीतेंगे तो विजयकी प्राप्ति होगी॥ २५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    त्रय०।

    (मुद्रित पृष्ठ 605)

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