श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.76.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 76 · अथ षट्सप्ततितमोऽध्यायः

विव्याध पंचविंशत्या स्वर्णपुंखैरयोमुखैः।

शाल्वस्य ध्वजिनीपालं शरैः सन्‍नतपर्वभिः॥ १८

vivyādha paṃcaviṃśatyā svarṇapuṃkhairayomukhaiḥ|

śālvasya dhvajinīpālaṃ śaraiḥ sannataparvabhiḥ|| 18

अर्थ

प्रद्युम्‍नजीके बाणोंमें सोनेके पंख एवं लोहेके फल लगे हुए थे। उनकी गाँठें जान नहीं पड़ती थीं। उन्होंने ऐसे ही पचीस बाणोंसे शाल्वके सेनापतिको घायल कर दिया॥ १८॥

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