प्रद्युम्नजीके बाणोंमें सोनेके पंख एवं लोहेके फल लगे हुए थे। उनकी गाँठें जान नहीं पड़ती थीं। उन्होंने ऐसे ही पचीस बाणोंसे शाल्वके सेनापतिको घायल कर दिया॥ १८॥
विव्याध पंचविंशत्या स्वर्णपुंखैरयोमुखैः।
शाल्वस्य ध्वजिनीपालं शरैः सन्नतपर्वभिः॥ १८
प्रद्युम्नजीके बाणोंमें सोनेके पंख एवं लोहेके फल लगे हुए थे। उनकी गाँठें जान नहीं पड़ती थीं। उन्होंने ऐसे ही पचीस बाणोंसे शाल्वके सेनापतिको घायल कर दिया॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.76.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 604) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/18/